समय का अभाव, मानव पर प्रभाव - Spritual Scientist की नजर से
“समय बदल दो दुनिया का उद्धार हो जाएगा, फिर से मानव दुनिया का सरदार हो जाएगा “
पिछले अंक में मैंने कारण लिखा था, समय को ठीक करने का Contract मैंने क्यों लिया।
अपनी मर्जी से, क्योंकि मुझे भगवान मिले ही नहीं, जिनसे मैं ये काम करने की अनुमति लेता। क्योंकि मैं कृष्ण को ही अपना मन मानता हूं और बुद्धि को शिव और हृदय को ऊर्जा यानी महेश, बस फर्क यह है कि, उस हृदय वाली ऊर्जा को नाम मैने दिया कृष्णांश, यानी कृष्ण है अंश जिसका ।
चलिये अब आगे की यात्रा शुरू करते हैं।
समय की यात्रा, या समय में यात्रा – जो भी समझा जाये; कारण एक माना है इस यात्रा का, समय को ठीक करना यानि समय बीमार है और सारी पृथ्वी के रहने वालों की जिन्दगी को हैरान परेशान कर रखा है बिना कारण। या कारण जो भी हो तो, उस कारण का निवारण अब अति आवश्यक हो गया है और किस्मत का मैं धनी हूं तो निवारण करना मेरे लिये तो सम्भव है ही।
अगला कदम मैंने जैसे ही रखा तो तपाक से एक और वाक्य सुनने में आया कि, वर्तमान में जीना सीखो। भूतकाल में कब तक अटके रहोगे और भविष्य की चिन्ता में क्यों जीवन बरबाद कर रहे हो, पता नहीं। कल हो या ना हो। और ये वाक्य काफी था मुझे ये समझाने हेतु कि तुझे कोई और काम का काम नहीं है जो ये फालतू का काम ले कर चल पड़ा है।
छोड़ समय को ठीक करना जैसी मूर्खता भरी बात को, और अपनी योग्यता अनुसार काम कर पैसे कमा मौज कर। और एक बार को मुझे भी लगा यही, परन्तु किस्मत को आगे रखकर जब मैने सोचा, तो लगा मैं ही एक ऐसा प्राणी हूं पृथ्वी पर जो ये काम कर सकता है। अन्यथा बस बीमार समय को ही झेलते रहो, और मैने उपरोक्त वाक्य को नकार दिया। और आधार बनाया कि, भविष्य की चिन्ता करोगे तो वर्तमान को आनंद पूर्वक बिताया जा सकता है।
इस आधार को बल मिला विवाह की प्रक्रिया को समझ कर। जब भी विवाह के लिये वर या वधु की खोज शुरू की जाती है तो सबसे अधिक सबसे पहले और सबके द्वारा ही विचार किया जाता है कि भविष्य कैसा रहेगा किस तरह के spouse की खोज करी जाये और उसी आधार पर resume बनाया जाता है, जिससे उसी प्रकार के लोग सम्पर्क करें।
दूसरा point मुझे मिला कि क्या शिक्षा दिलवाई जाये बच्चे को, जिससे वो भविष्य में अपने पैरो पर खड़ा हो सके, किसी पर निर्भर ना रहना पड़े ! और भी कई सारे कारण मिले जिस से मुझे सांत्वना मिली, आत्मविश्वास बढ़ा कि, मैं सही दिशा में चलने लगा हूँ।
पिछले अंक में मैंने कारण लिखा था, समय को ठीक करने का Contract मैंने क्यों लिया।
अपनी मर्जी से, क्योंकि मुझे भगवान मिले ही नहीं, जिनसे मैं ये काम करने की अनुमति लेता। क्योंकि मैं कृष्ण को ही अपना मन मानता हूं और बुद्धि को शिव और हृदय को ऊर्जा यानी महेश, बस फर्क यह है कि, उस हृदय वाली ऊर्जा को नाम मैने दिया कृष्णांश, यानी कृष्ण है अंश जिसका ।
Time Scientist Prof. Ashwani Agarwal
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